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Explainer: अमेरिका-ईरान में सीजफायर पर बातचीत हुई फेल तो पाकिस्तान का क्या होगा?...जानें एक्सपर्ट व्यू

 Published : Apr 10, 2026 05:33 pm IST,  Updated : Apr 10, 2026 06:51 pm IST

ईरान-अमेरिका के बीच शांति वार्ता को लेकर पाकिस्तान बेहद उत्सुक है, लेकिन यह बातचीत अधर में लटकती दिख रही है। ईरान की ओर से अभी तक प्रतिनिधित्व को लेकर कोई स्पष्टीकरण नहीं आया है। ऐसे में सवाल है कि अगर ये वार्ता फेल हुई तो पाकिस्तान का क्या होगा?

इस्लामाबाद में ईरान-अमेरिका शांति वार्ता को लेकर सुरक्षा सख्त। - India TV Hindi
इस्लामाबाद में ईरान-अमेरिका शांति वार्ता को लेकर सुरक्षा सख्त। Image Source : AP

Explainer: ईरान-अमेरिका शांति वार्ता के लिए पाकिस्तान ने पूरी तैयारी कर ली है। शुक्रवार को इस्लामाबाद में इस बैठक के मद्देनजर सुरक्षा के सख्त इंतजाम देखे गए। अमेरिका की तरफ से इस बैठक का प्रतिनिधित्व करने उपराष्ट्रपति और ट्रंप के सबसे करीबी सहयोगी जेडी वेंस पहुंच रहे हैं। जबकि ईरान की तरफ से इस बैठक में कोई शामिल होगा भी या नहीं, इसे लेकर अब तक कोई स्पष्टता सामने नहीं आ सकी है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और फील्ड मार्शल चीफ असीम मुनीर ईरान-अमेरिका युद्ध विराम के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने के अवसर को बड़ी उपलब्धि के तौर पर देख रहे हैं। हालांकि इस शांति वार्ता पर आशंका के बादल छाये हुए हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि अगर यह बैठक फेल हुई या युद्ध विराम नहीं हो सका तो पाकिस्तान का क्या होगा?

मौजूदा हालात पर क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के असिस्टेंट प्रोफेसर और विदेशी मामलों के जानकार डॉ. अभिषेक श्रीवास्तव कहते हैं कि पाकिस्तान को ऐसी परिस्थितियों में एक कठिन संतुलन बनाना पड़ेगा। अमेरिका का दबाव रहेगा कि अगर यह वार्ता फेल होती है तो पाकिस्तान ईरान से उचित दूरी बनाए रखे। यह पाकिस्तान के लिए दोधारी तलवार होगी। वह अगर अमेरिका के ज्यादा करीब होता है तो भी दिक्कत है और ईरान के ज्यादा करीब जाता है तो भी मुश्किल है।

चीन-ईरान-रूस की धुरी हो सकती है मजबूत

प्रो. अभिषेक ने कहा कि अगर ईरान-अमेरिका युद्धविराम शांति वार्ता फेल हुई तो इससे चीन–ईरान–रूस की धुरी मजबूत हो सकती है, जिसमें पाकिस्तान को अपनी स्थिति स्पष्ट करनी होगी। इस “रणनीतिक संदेह” से पाकिस्तान की विदेश नीति कमजोर हो  सकती है। वजह साफ है कि यदि पाकिस्तान ईरान के करीब जाता है, तो उसकी पश्चिम के साथ दूरी बढ़ेगी और दूसरी तरफ अगर वह अमेरिका के साथ जाता है, तो ईरान और कुछ क्षेत्रीय देशों के साथ तनाव बढ़ेगा। इस “No-Win Situation” से उसकी वैश्विक स्थिति कमजोर होगी। क्योंकि पहले से ही पाकिस्तान की छवि: “Terror Safe haven” के रूप में है, जिसकी आलोचना झेलती रही है। इधर क्षेत्रीय संघर्ष बढ़ा तो हिजबुल्लाह, हमास का नैरेटिव और ज्यादा मजबूत हो जाएगा। 

पाकिस्तान की क्या है मंशा?

पाकिस्तान इन दिनों खुद को अमेरिका और ईरान के बीच एक अनोखे कूटनीतिक ब्रिज के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया था कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और आर्मी चीफ फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के अनुरोध पर 8 अप्रैल को ईरान पर होने वाले भारी हमले को उन्होंने टाल दिया और उसके बाद दो सप्ताह के अस्थायी सीजफायर की घोषणा की। ट्रंप के अनुसार इसमें होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने का प्रावधान भी शामिल था। अब 10-11 अप्रैल को इस्लामाबाद में उच्चस्तरीय वार्ता होनी है। इसमें अमेरिका की ओर से उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस, स्टीव विटकॉफ और जारेड कुश्नर (ट्रंप के दामाद) जैसे बड़े नाम शामिल हैं। जबकि ईरान की ओर से 10 सदस्यीय टीम के आने का दावा किया गया है। हालांकि ईरान की ओर से अभी यह स्पष्ट नहीं है कि उनका कोई प्रतिनिधि मंडल इस वार्ता में शामिल होगा या नहीं। पाकिस्तान की मंशा इस सीजफायर में मध्यस्थता के जरिये वैश्विक स्तर पर अपनी छवि सुधारने की है। ताकि उसे अमेरिका और यूएई जैसे देशों व आईएमएफ से और अधिक कर्ज मिल सके। 

पाकिस्तान के लिए बड़ा कूटनीतिक दांव

ईरान-अमेरिका में सीजफायर करवाने की मध्यस्थता करना पाकिस्तान के लिए बड़ा कूटनीतिक दांव है। अगर इसमें सफलता मिली तो पाकिस्तान की क्षेत्रीय छवि में सुधार होगा। वहीं, अगर बातचीत फेल हो गई और युद्ध दोबारा शुरू हो गया तो पाकिस्तान के लिए स्थिति बेहद मुश्किल हो जाएगी। इसका सबसे बड़ा असर पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति पर पड़ेगी, जो पहले से ही गंभीर संकटों के दौर से गुजर रही है। इस दौरान पाकिस्तान की उच्च मुद्रास्फीति, विदेशी मुद्रा भंडार की कमी और भारी कर्ज का बोझ है। होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के 20% तेल सप्लाई करने का मार्ग है। 

सीजफायर टूटा तो पाकिस्तान का क्या होगा?

अगर सीजफायर टूटा और ईरान ने फिर से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लगातार बंद रखा या विस्फोटक माइन्स बिछा दिए तो तेल की कीमतें फिर आसमान छूने लगेंगी। इसका सबसे बुरा असर पाकिस्तान पर ही होगा। वह इस रास्ते 80% से ज्यादा तेल आयात करता है। ऐसे में पाकिस्तान में तेल की कीमतों में 30-50% उछाल आ सकता है। परिवहन महंगा हो जाएगा। इससे मुद्रास्फीति, गरीबी बढ़ेगी और IMF जैसे ऋणदाताओं के साथ नए सौदे पाकिस्तान के लिए मुश्किल हो जाएंगे। साथ ही पाकिस्तान के लिए सऊदी अरब के साथ हाल में साइन किया गया स्ट्रैटेजिक म्यूचुअल डिफेंस एग्रीमेंट भी मुश्किल पैदा कर सकता है। क्योंकि अगर युद्ध बढ़ा और सऊदी अरब पर कोई खतरा हुआ तो पाकिस्तान को सैन्य सहयोग देना पड़ सकता है, जो उसकी अर्थव्यवस्था और सेना दोनों पर बोझ बनेगा। इसके अलावा अगर वह सऊदी के साथ ईरान पर हमला करता है तो पाकिस्तान तेहरान समेत अन्य मुस्लिम मुल्कों का भी दुश्मन बन जाएगा। वहीं अगर ऐसा नहीं करता तो वह अमेरिका के दुश्मनी मोल ले बैठेगा। इसलिए पाकिस्तान दोधारी तलवार पर है। 

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